भारतीय राजनीति का वैचारिक संघर्ष और भविष्य
युवा आंदोलन और समाज का नजरिया: वर्तमान परिदृश्य में समाज के तीन अलग-अलग चेहरे।
जंतर मंतर, नई दिल्ली सहित देश भर के अनेक भागों में चल रहे छात्रों-युवाओं के आंदोलन के मद्देनजर समाज के तीन चहरे दिखाई देने लगे है। एक-आंदोलन के पक्षधर, दूसरे-आंदोलन विरोधी एवं तीसरे बीच के लोग जो तटस्थ हैं या तमाशा देख कर पल पल में पाला बदल रहे हैं। इस स्थिति में वर्तमान सामाजिक परिदृश्य के विवेचन की जरूरत आन पड़ी है। किसी मुद्दे का विरोध या समर्थन लोग अपनी राजनीतिक या सामाजिक विचारधारा की समझ के आधार पर करते हैं। आज का युवा शिक्षा, रोजगार, समान अवसर और सम्मानजनक भविष्य चाहता है। वह डिजिटल दुनिया से जुड़ा है और पहले की तुलना में अधिक जानकारी रखता है। आज देशभर में युवा बेरोजगारी, परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं और शिक्षा से जुड़े प्रश्नों पर आवाज उठा रहे हैं।
इस आधार पर फिलहाल समाज दो विचारधाराओं के बीच टकराहट से गुजर रहा है। एक प्रगतिशील एवं सृजनात्मक और दूसरी प्रतिगामी या रूढ़िवादी। इसी आधार पर पढ़े लिखे युवा, छात्र, मजदूर-किसान, मीडियाकर्मी, बुद्धिजीवी, राजनेता, कलाकार आदि वर्तमान घटनाक्रम पर दो बड़े धड़ों में बंट गया दिखाई दे रहा है। भारतीय समाज का सुधि वर्ग जानता है कि यह देश एक बहुलतावादी, लोकतांत्रिक और विविधतापूर्ण समाज से बना है। यहाँ अनेक धर्म, भाषाएँ, जातियाँ, संस्कृतियाँ, परंपराएँ और जीवन-दृष्टियाँ सह-अस्तित्व में रही हैं।
भारतीय समाज का विकास हमेशा दो समानांतर धाराओं के बीच संघर्ष का परिणाम रहा है—एक ओर ऐसी विचारधारा है जो स्वतंत्रता, समानता, न्याय, वैज्ञानिक चेतना, मानव गरिमा, सामाजिक सुधार और रचनात्मक परिवर्तन को महत्व देती है; दूसरी ओर ऐसी शक्तियाँ हैं जो असमानता, अंधविश्वास, रूढ़िवाद, सामाजिक वर्चस्व और अतीत की चुनिंदा व्याख्याओं को बनाए रखना चाहती हैं। आज भारत का समसामयिक राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य इसी वैचारिक संघर्ष का एक जटिल और महत्वपूर्ण दौर है।
प्रगतिशील विचारधारा का मूल विश्वास है कि समाज स्थिर और अपरिवर्तनीय नहीं होता। समय, ज्ञान, विज्ञान और मानवीय अनुभव के साथ समाज में परिवर्तन आवश्यक है। प्रगतिशीलता का अर्थ परंपरा का अंधा विरोध नहीं, बल्कि परंपराओं का विवेकपूर्ण मूल्यांकन है। जो परंपराएँ मानव गरिमा, समानता और सामाजिक सद्भाव को बढ़ाती हैं, उन्हें स्वीकार किया जा सकता है; लेकिन जो परंपराएँ शोषण, भेदभाव और असमानता को स्थायी बनाती हैं, उन्हें बदलना आवश्यक है।
सृजनात्मक मूल्य व्यक्ति और समाज में नई संभावनाओं का निर्माण करते हैं। लोकतंत्र, स्वतंत्र चिंतन, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय, पर्यावरण संरक्षण, शिक्षा, रचनात्मकता और संवाद इसके प्रमुख आधार हैं। भारतीय संविधान इन मूल्यों का सबसे व्यापक और आधुनिक दस्तावेज है। संविधान व्यक्ति की स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुता को लोकतांत्रिक जीवन का आधार मानता है।
भारतीय सामाजिक सुधार आंदोलन की लगभग सभी विभूतियों ने समाज की रूढ़ियों को चुनौती दी थी और आज यह सिलसिला जारी है। उन्होंने यह स्थापित किया कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब वह अपने भीतर मौजूद असमानताओं और अन्याय का सामना करने का साहस रखता हो।
प्रतिगामी विचारधारा मूलतः उस मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती है जो सामाजिक परिवर्तन से भयभीत होती है। यह अतीत को एक आदर्श स्वर्णयुग के रूप में प्रस्तुत कर वर्तमान की समस्याओं से बचने का प्रयास करती है। प्रतिगामी सोच जाति, पितृसत्ता, धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास, सामाजिक वर्चस्व और असमानता को किसी न किसी रूप में वैध ठहराने का प्रयास कर सकती है।
प्रतिगामिता केवल किसी एक राजनीतिक दल या संगठन तक सीमित नहीं होती। यह किसी भी विचार, संस्था या सामाजिक व्यवहार में मौजूद हो सकती है, जब वह प्रश्न पूछने, असहमति और परिवर्तन को अस्वीकार करे। लोकतंत्र में सबसे बड़ा खतरा तब पैदा होता है जब सत्ता या समाज आलोचना को शत्रुता समझने लगे और नागरिक स्वतंत्रता को अनुशासन के नाम पर सीमित करने लगे।
भारत की समकालीन राजनीति में विकास, राष्ट्रवाद, सामाजिक न्याय, धर्म, पहचान, कल्याणकारी योजनाओं और आर्थिक विकास के प्रश्न प्रमुख हैं। इन प्रश्नों पर व्यापक राजनीतिक बहस हो रही है। एक ओर आधुनिक बुनियादी ढाँचे, डिजिटल तकनीक, आर्थिक विकास, उद्यमिता और वैश्विक प्रतिष्ठा की बात की जाती है; दूसरी ओर बेरोजगारी, महँगाई, कृषि संकट, असमानता, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे सवाल भी गंभीर बने हुए हैं।
यहीं प्रगतिशील और प्रतिगामी मूल्यों का संघर्ष दिखाई देता है। प्रगतिशील दृष्टि विकास को केवल बड़ी परियोजनाओं और आर्थिक वृद्धि तक सीमित नहीं करती, बल्कि पूछती है कि विकास का लाभ किसे मिल रहा है? क्या गरीब, किसान, मजदूर, महिलाएँ, दलित, आदिवासी और वंचित समूह भी विकास की मुख्यधारा में समान रूप से शामिल हैं?
इसके विपरीत, प्रतिगामी राजनीति अक्सर जटिल सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के सरल और भावनात्मक समाधान प्रस्तुत करती है। बेरोजगारी, महँगाई या असमानता जैसे प्रश्नों के स्थान पर धार्मिक, जातीय या सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना देना जनता का ध्यान वास्तविक समस्याओं से हटाने का माध्यम बन सकता है।
आज राष्ट्रवाद भारतीय राजनीति का एक अत्यंत प्रभावशाली विचार है। राष्ट्र के प्रति प्रेम, राष्ट्रीय एकता और देश की सुरक्षा लोकतांत्रिक समाज के स्वाभाविक मूल्य हैं। किंतु प्रगतिशील राष्ट्रवाद नागरिकों को समान अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों के आधार पर जोड़ता है। वह विविधता को राष्ट्र की शक्ति मानता है। इसके विपरीत, संकीर्ण राष्ट्रवाद राष्ट्र की एक ही सांस्कृतिक या धार्मिक पहचान निर्धारित करने का प्रयास कर सकता है। इससे असहमति रखने वाले नागरिकों को राष्ट्र-विरोधी घोषित करने का खतरा उत्पन्न होता है। लोकतंत्र में देशभक्ति का अर्थ सरकार की हर नीति का समर्थन करना नहीं है। एक नागरिक सरकार की आलोचना करते हुए भी देश के प्रति पूरी तरह समर्पित हो सकता है।
वास्तव में, लोकतंत्र में असहमति राष्ट्र-विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जीवन की आवश्यक शर्त है। सत्ता से प्रश्न पूछना नागरिक का अधिकार है और सत्ता का उत्तरदायित्व है कि वह प्रश्नों का उत्तर दे।
भारतीय समाज में जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्रीय पहचान आज भी महत्वपूर्ण सामाजिक वास्तविकताएँ हैं। सामाजिक न्याय और वंचित समुदायों के अधिकारों के लिए पहचान की राजनीति ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन जब पहचान का उपयोग सामाजिक न्याय के बजाय घृणा और विभाजन के लिए किया जाता है, तब वह प्रतिगामी रूप ग्रहण कर लेती है।
प्रगतिशील विचारधारा पहचान को नकारती नहीं, बल्कि उसे समानता और न्याय के व्यापक ढाँचे से जोड़ती है। उसका लक्ष्य यह है कि व्यक्ति की जाति, धर्म, लिंग या भाषा उसके अधिकारों में बाधा न बने।
आज महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक भागीदारी और नेतृत्व में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। फिर भी पितृसत्तात्मक सोच, लैंगिक हिंसा और असमान अवसर जैसी समस्याएँ बनी हुई हैं। इसी प्रकार दलितों, आदिवासियों और अन्य वंचित समूहों के लिए संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक न्याय की आवश्यकता अभी समाप्त नहीं हुई है।
प्रगतिशील समाज वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आलोचनात्मक चिंतन को प्रोत्साहित करता है। विज्ञान केवल प्रयोगशालाओं का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक तार्किक पद्धति है। अंधविश्वास, अफवाह और छद्म-विज्ञान सामाजिक विकास को बाधित करते हैं।
आज सोशल मीडिया ने सूचना के लोकतंत्रीकरण को संभव बनाया है, लेकिन इसके साथ फेक न्यूज, घृणा-भाषण और सूचना के दुरुपयोग की चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। ऐसी स्थिति में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मीडिया साक्षरता और स्वतंत्र पत्रकारिता का महत्व बढ़ जाता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आत्मा है। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी को हिंसा या घृणा फैलाने की स्वतंत्रता हो; लेकिन आलोचना, व्यंग्य, साहित्य, कला और राजनीतिक असहमति को दबाना लोकतांत्रिक समाज के लिए खतरनाक है। सृजनात्मक समाज वही है जहाँ प्रश्न पूछे जा सकते हैं और नए विचारों के लिए स्थान हो।
भारत का युवा वर्ग इस वैचारिक संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। युवा शिक्षा, रोजगार, समान अवसर और सम्मानजनक भविष्य चाहता है। वह डिजिटल दुनिया से जुड़ा है और पहले की तुलना में अधिक जानकारी रखता है। आज देशभर में युवा बेरोजगारी, परीक्षाओं, भर्ती प्रक्रियाओं और शिक्षा से जुड़े प्रश्नों पर आवाज उठा रहे हैं।
युवा को केवल चुनावी भीड़, सोशल मीडिया समर्थक या राजनीतिक नारे लगाने वाला समूह समझना लोकतांत्रिक भूल है। वह देश का वर्तमान भी है और भविष्य भी। यदि युवा प्रश्न पूछता है, तो उसे राष्ट्र-विरोधी नहीं बल्कि लोकतंत्र का सक्रिय नागरिक समझा जाना चाहिए।
भारत का वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य एक महत्वपूर्ण वैचारिक मोड़ पर खड़ा है। एक ओर संविधान-आधारित लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, समानता, स्वतंत्रता और मानवीय गरिमा के प्रगतिशील मूल्य हैं; दूसरी ओर धार्मिक कट्टरता, सामाजिक वर्चस्व, अंधविश्वास, असहमति का दमन और अतीत के गौरव के नाम पर वर्तमान समस्याओं से बचने वाली प्रतिगामी प्रवृत्तियाँ हैं।
भारत का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि समाज किस दिशा को चुनता है। प्रगतिशीलता का अर्थ अपनी जड़ों से कटना नहीं, बल्कि जड़ों से शक्ति लेकर भविष्य की ओर बढ़ना है। सृजनात्मकता का अर्थ केवल कला या साहित्य नहीं, बल्कि राजनीति, शिक्षा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संबंधों में नए और न्यायपूर्ण विकल्पों का निर्माण भी है।
आज आवश्यकता किसी व्यक्ति या दल के अंध-समर्थन की नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण नागरिकता की है। भारत को ऐसा राष्ट्र बनाना होगा जहाँ राष्ट्रवाद लोकतंत्र का विरोधी नहीं, उसका सहयोगी हो; जहाँ धर्म मानवता से बड़ा न हो; जहाँ विकास न्याय के बिना अधूरा माना जाए; जहाँ युवा सवाल पूछ सके; जहाँ महिला स्वतंत्र होकर जी सके; जहाँ दलित और आदिवासी सम्मान के साथ आगे बढ़ सकें; और जहाँ असहमति को देशद्रोह नहीं, लोकतंत्र की शक्ति माना जाए।
प्रगतिशील और प्रतिगामी विचारधाराओं का संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता का संघर्ष नहीं है। यह मनुष्य की स्वतंत्रता और भय, तर्क और अंधविश्वास, समानता और वर्चस्व, भविष्य और अतीत की जड़ता के बीच संघर्ष है। भारत की लोकतांत्रिक और संवैधानिक आत्मा का स्वाभाविक पक्ष प्रगतिशील, मानवीय और सृजनात्मक मूल्यों के साथ है। इसलिए भारत के भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है—विवेकपूर्ण नागरिक, स्वतंत्र विचार, सामाजिक न्याय और ऐसी राजनीति जो जनता को विभाजित नहीं, बल्कि समानता और बंधुता के आधार पर एकजुट करे।
शानदार
बहुत अच्छा लेख लिखा है सर आपने