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बराबरी की ओर: भारत में LGBTQIA+ समुदाय और विवाह समानता का प्रश्न : विवाह के लिए कानूनी लड़ाई और समुदाय के सामने आने वाली चुनौतियाँ

November 07, 2025 04:11 PM
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बराबरी की ओर: भारत में LGBTQIA+ समुदाय और विवाह समानता का प्रश्न : विवाह के लिए कानूनी लड़ाई और समुदाय के सामने आने वाली चुनौतियाँ
बराबरी की ओर: LGBTQIA+ समुदाय और विवाह समानता

भारत समेत विश्व के अनेक देशों में LGBTQIA+ समुदाय के अधिकारों को लेकर चल रही बहस अब केवल सामाजिक और सांस्कृतिक विमर्श का हिस्सा नहीं रही, बल्कि यह संवैधानिक अधिकारों और मानवाधिकारों का मूल प्रश्न बन चुकी है। विवाह समानता (Marriage Equality) का मुद्दा विशेष रूप से उस धुरी पर खड़ा है, जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समान नागरिक अधिकार और सामाजिक स्वीकृति आपस में टकराते और संतुलन खोजते हैं।

भारत के संदर्भ में देखें तो धारा 377 के ऐतिहासिक निर्णय (2018) ने समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकालकर LGBTQIA+ समुदाय को संवैधानिक गरिमा का अधिकार दिया। इसके बावजूद विवाह, गोद लेने और उत्तराधिकार जैसे नागरिक अधिकारों को लेकर समुदाय अब भी सीमाओं और संघर्षों से जूझ रहा है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने विवाह समानता पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि यह मुद्दा विधायिका के क्षेत्राधिकार का है, न्यायपालिका कानून बना नहीं सकती।

कार्यस्थल पर भेदभाव (Workplace Discrimination)

भारत में गैर-समावेशी व्यवहार

70%

LGBTQIA+ कर्मचारी प्रभावित

वैश्विक औसत (Global Avg)

42%

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तुलना

स्रोत: डेलॉयट सर्वेक्षण 2023
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: धारा 377 से मुक्ति

भारत में LGBTQIA+ अधिकारों की लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव था धारा 377 का आंशिक निरसन। 1861 में ब्रिटिश काल में लागू यह कानून "प्रकृति के विपरीत यौन संबंध" को अपराध घोषित करता था।

कानूनी यात्रा (Legal Timeline)

2009
दिल्ली हाई कोर्ट ने धारा 377 को आंशिक रूप से असंवैधानिक घोषित किया (नाज़ फाउंडेशन)।
2013
सुप्रीम कोर्ट ने सुरेश कुमार कौशल मामले में 2009 के फैसले को पलट दिया।
2014
NALSA फैसला: ट्रांसजेंडर समुदाय को 'तीसरे लिंग' की मान्यता मिली।
2018
नवतेज सिंह जौहर फैसला: धारा 377 आंशिक रूप से निरस्त, समलैंगिकता अपराध नहीं।
2023
सुप्रीम कोर्ट ने विवाह समानता की मांग को खारिज किया।
ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019

NALSA के निर्देशों के बाद, 2019 में ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम पारित किया गया। यद्यपि यह एक महत्वपूर्ण कदम था, फिर भी इसकी कई आलोचनाएँ भी हैं।

सकारात्मक प्रावधान (Positives) आलोचनाएं (Criticisms)
ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के विरुद्ध भेदभाव का निषेध। NALSA के निर्देशानुसार आरक्षण (Reservation) का प्रावधान नहीं।
पहचान प्रमाणपत्र (Identity Certificate) का प्रावधान। यौन शोषण की स्पष्ट परिभाषा का अभाव।
शिक्षा और रोजगार में अधिकार। अनुपालन न करने पर दंड के कड़े प्रावधान की कमी।
समलैंगिक विवाह के लिए कानूनी संघर्ष

17 अक्टूबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने सुप्रिया चक्रबर्ती बनाम भारत संघ के मामले में समलैंगिक विवाह की मांग को खारिज कर दिया।

"विवाह कोई अयोग्य मौलिक अधिकार नहीं है। यह एक वैधानिक संस्था है जो विधायी नियंत्रण के अधीन है।"
- सुप्रीम कोर्ट संवैधानिक पीठ (सर्वसम्मति)

न्यायालय ने कहा कि वह विशेष विवाह अधिनियम 1954 में "पति" और "पत्नी" शब्दों का अर्थ नहीं बदल सकता। यह परिवर्तन केवल संसद के माध्यम से हो सकता है।

सिविल यूनियन पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय (3:2)

बहुमत (3 जज) ने सिविल यूनियन का अधिकार नहीं माना, जबकि 2 जजों ने समर्थन दिया।

समुदाय के सामने चुनौतियां: हिंसा और अपराध

भारत में LGBTQIA+ समुदाय के खिलाफ हिंसा एक गंभीर समस्या है। कोलकाता के एक अध्ययन के अनुसार, MSM समुदाय के 80% लोगों ने किसी न किसी प्रकार की हिंसा का सामना किया है।

कोलकाता में हिंसा के प्रकार (प्रतिशत में)

मौखिक हिंसा और शारीरिक हिंसा की दरें चिंताजनक रूप से उच्च हैं।

सिस्टम की विफलता: डेटा में अंतर

4.88 लाख

कुल ट्रांसजेंडर आबादी (2011 जनगणना)

VS

236

दर्ज अपराध पीड़ित (NCRB 2022)

ट्रांसजेंडर व्यक्ति आबादी का 0.53% हैं लेकिन अपराध पीड़ितों का केवल 0.006%।

शिक्षा क्षेत्र में बाधाएं

स्कूलों और कॉलेजों में भेदभाव, लैंगिक संवेदनशीलता की कमी और सुरक्षित शौचालयों की अनुपस्थिति के कारण ड्रॉप-आउट दर बहुत अधिक है।

दिल्ली में ट्रांसजेंडर शिक्षा स्थिति (केरल डेवलपमेंट सोसायटी अध्ययन)

  • 29.11% ट्रांसजेंडर व्यक्ति दिल्ली में कभी स्कूल नहीं गए।
  • 5.33% ट्रांसजेंडर व्यक्ति ही स्नातक (Graduate) हैं।
  • 61,214 कुल नामांकित ट्रांसजेंडर छात्र (पूरे भारत में)।
आगे की राह और सुझाव

भारत में LGBTQIA+ समुदाय की पूर्ण स्वीकृति और समानता के लिए न केवल कानूनी सुधार बल्कि व्यापक सामाजिक परिवर्तन की आवश्यकता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से संसद पर गेंद फेंकी है, और अब यह राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। समानता का मार्ग लंबा हो सकता है, लेकिन प्रत्येक कानूनी जीत और सामाजिक स्वीकृति का प्रत्येक कदम समुदाय को न्यायसंगत भारत के सपने के करीब ले जाता है।

Keywords:

LGBTQIA Rights Marriage Equality Supreme Court India Section 377 Gender Justice NALSA Verdict Transgender Rights Discrimination
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