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GOVERNANCE

सर्वे, सत्ता और समाज: बिहार की राजनीति का बदलता चेहरा बिहार की राजनीति: जाति सर्वेक्षण, राजनीतिक के आयाम और शासन

October 29, 2025 03:25 PM
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सर्वे, सत्ता और समाज: बिहार की राजनीति का बदलता चेहरा बिहार की राजनीति: जाति सर्वेक्षण, राजनीतिक के आयाम और शासन

भारतीय राजनीति के विमर्श में जाति सदैव एक केंद्रीय तत्व रही है।

बिहार की राजनीति: जाति सर्वेक्षण, राजनीतिक के आयाम और शासन

इसी संदर्भ में 2023 में बिहार में हुए जाति आधारित सर्वेक्षण को एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक-प्रशासनिक हस्तक्षेप माना जा सकता है। यह सर्वेक्षण केवल आँकड़ों का संकलन भर नहीं है, बल्कि यह राज्य की राजनीति में सामाजिक न्याय (Social Justice), प्रतिनिधित्व (Representation) और नीति-निर्माण (Policy-making) के नए विमर्शों को जन्म देता है। राजनीतिक पुनर्संरेखण (Political Realignment) की प्रक्रियाएँ अब केवल जातीय प्रतीकों या नारेबाज़ी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे ठोस आँकड़ों और सामाजिक संरचना की वैज्ञानिक समझ पर आधारित हो रही हैं।

साथ ही, इस पहल ने लोकतांत्रिक शासन की प्रभावशीलता (Effectiveness of Governance) और जवाबदेही (Accountability) पर भी प्रश्न खड़े किए हैं। क्या जातीय आंकड़े संसाधनों के अधिक न्यायसंगत वितरण की ओर ले जाएँगे, या वे एक बार फिर से पहचान-आधारित राजनीति को ही प्रबल बनाएँगे?

स्पष्ट है कि बिहार का जाति सर्वेक्षण केवल एक प्रशासनिक या सांख्यिकीय अभ्यास नहीं है; यह भारतीय लोकतंत्र में समाजशास्त्र और राजनीति के अंतर्संबंध का एक महत्त्वपूर्ण अध्ययन है, जो न केवल राज्य की सत्ता संरचनाओं को पुनर्परिभाषित करता है, बल्कि सामाजिक न्याय की अवधारणा और लोकतांत्रिक शासन की भविष्य दिशा को भी गहराई से प्रभावित करता है। साथ ही, नीतीश कुमार की लगातार गठबंधन बदलने की नीति और राज्य की शासन चुनौतियां बिहार की राजनीति को जटिल बनाती रहती हैं।

जाति सर्वेक्षण: बिहार का ऐतिहासिक कदम

सर्वेक्षण के मुख्य निष्कर्ष

2023 में जारी बिहार जाति आधारित सर्वेक्षण के निष्कर्षों ने भारतीय राजनीति में एक नई बहस छेड़ दी है। सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार की कुल 13.07 करोड़ जनसंख्या में अति पिछड़ा वर्ग (EBC) सबसे बड़ा समूह है, जो 36% आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) 27% के साथ दूसरे स्थान पर है, जबकि अनुसूचित जाति 19.65% और सामान्य वर्ग केवल 15.5% आबादी का हिस्सा है।

Bihar Caste-wise Population Distribution (2023 Caste Survey)

*शेष प्रतिशत में अनुसूचित जनजाति (ST) एवं अन्य शामिल हैं।

यह सर्वेक्षण तीन चरणों में पूरा किया गया था। पहला चरण जनवरी 2023 में परिवारों की गिनती के साथ शुरू हुआ, जबकि द्वितीय चरण अप्रैल 2023 में आर्थिक और जातिगत डेटा संग्रह के लिए शुरू किया गया था। कुल मिलाकर 2.64 लाख गणनाकर्ताओं ने 2.9 करोड़ परिवारों के डेटा एकत्र किए।

राजनीतिक प्रभाव

जाति सर्वेक्षण के निष्कर्षों का राजनीतिक प्रभाव व्यापक रहा है। अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग (EBC) समुदायों का संयुक्त रूप से 63% हिस्सा होना इस बात को दर्शाता है कि बिहार में पिछड़े वर्गों का राजनीतिक प्रभाव कितना मजबूत है। इससे राष्ट्रीय स्तर पर जाति आधारित जनगणना की मांग भी तेज हो गई है।

सर्वेक्षण के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि राज्य के 34.13% परिवार महीने में 6,000 रुपये या उससे कम पर गुजारा करते हैं, जो गरीबी रेखा के नीचे है। अनुसूचित जातियों में यह संख्या 43.93% तक पहुंच जाती है।

आर्थिक स्थिति: गरीबी रेखा से नीचे के परिवार

राजनीतिक पुनर्संरेखण: नीतीश कुमार की रणनीति

गठबंधन परिवर्तन का इतिहास

नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में "पल्टू राम" के नाम से प्रसिद्ध हैं, क्योंकि उन्होंने अपने राजनीतिक करियर में कई बार गठबंधन बदले हैं। 2005 से 2024 तक उनके प्रमुख गठबंधन परिवर्तन इस प्रकार हैं:

05
2005

BJP के साथ पहली बार मुख्यमंत्री बने

13
2013

नरेंद्र मोदी के मुद्दे पर BJP से अलग हुए

15
2015

RJD के साथ महागठबंधन बनाकर चुनाव जीता

17
2017

RJD छोड़कर पुनः BJP से गठबंधन

22
2022

BJP छोड़कर INDIA ब्लॉक में शामिल

24
2024

फिर से BJP-NDA में वापसी

2024-25 की राजनीतिक स्थिति

वर्तमान में नीतीश कुमार NDA के साथ हैं और 2025 के विधानसभा चुनाव में भी NDA के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। BJP और JD(U) के बीच सीट शेयरिंग का फॉर्मूला 102:101 तय हुआ है, जिसमें JD(U) को 102 और BJP को 101 सीटें मिल सकती हैं।

पार्टी प्रस्तावित सीटें गठबंधन
JD(U) 102 NDA
BJP 101 NDA

तेजस्वी यादव ने स्पष्ट कर दिया है कि अब नीतीश कुमार के साथ कोई गठबंधन नहीं होगा और उनका समय समाप्त हो गया है। RJD महागठबंधन के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है।

शासन और चुनौतियां

प्रशासनिक सुधार

नीतीश कुमार के शासनकाल में बिहार में कानून व्यवस्था की स्थिति में काफी सुधार हुआ है। उन्होंने Arms Act लागू किया, अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की, और Special Auxiliary Police (SAP) का गठन किया। 2005 के बाद से अपहरण और संगठित अपराधों में काफी कमी आई है।

विकास संबंधी चुनौतियां

बिहार की प्रमुख शासन चुनौतियों में शामिल हैं:

अधोसंरचना की कमी

सड़क, बिजली, और डिजिटल कनेक्टिविटी की समस्या। 2024 में 15 पुल गिरे, जो संकट को दर्शाता है।

गरीबी और बेरोजगारी

26.59% लोग बहुआयामी गरीबी में। राष्ट्रीय औसत (11.28%) से काफी अधिक।

स्वास्थ्य सेवाएं

उप-स्वास्थ्य केंद्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी 57-93% तक है।

बेरोजगारी समाधान: नीतीश कुमार ने बेरोजगार युवाओं के लिए 1000 रुपये मासिक भत्ता की घोषणा की है।

जातिगत राजनीति का प्रभाव

बिहार में जाति-आधारित राजनीति शासन पर गहरा प्रभाव डालती है। संसाधनों का वितरण, नौकरियों में नियुक्ति, और सामाजिक कल्याण योजनाओं का क्रियान्वयन अक्सर जातिगत आधार पर होता है। यह पारदर्शी और जवाबदेह शासन व्यवस्था के विकास में बाधक है।

आर्थिक प्रदर्शन और विकास

बिहार की आर्थिक वृद्धि दर 2023-24 में 9.2% रही, जो राष्ट्रीय औसत से अधिक है और राज्य को देश में तीसरे स्थान पर रखती है। हालांकि, प्रति व्यक्ति आय अभी भी राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।

राज्य सरकार ने हाशिए के समुदायों के लिए विभिन्न योजनाएं शुरू की हैं, जिनमें शिक्षा कार्यक्रम, कौशल विकास योजनाएं, और आर्थिक सहायता शामिल है। महिला सशक्तिकरण के लिए शराबबंदी नीति भी लागू की गई है।

भविष्य की चुनौतियां और अवसर

2025 के विधानसभा चुनाव में बिहार की राजनीति एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है। जाति सर्वेक्षण के निष्कर्षों के आधार पर सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीति तैयार कर रहे हैं। NDA गठबंधन नीतीश कुमार के नेतृत्व में एकजुट दिख रहा है, जबकि महागठबंधन तेजस्वी यादव के नेतृत्व में नई ऊर्जा के साथ चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी कर रहा है।

राज्य को सतत विकास के लिए जातिगत राजनीति से ऊपर उठकर संस्थागत सुधारों की आवश्यकता है। अवसंरचना विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, और रोजगार सृजन पर फोकस करना आवश्यक है।

बिहार की राजनीति में जाति सर्वेक्षण, राजनीतिक पुनर्संरेखण, और शासन की चुनौतियां परस्पर जुड़ी हुई हैं। राज्य के भविष्य के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक नेतृत्व इन चुनौतियों से निपटकर समावेशी विकास की दिशा में काम करे।

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