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संविधान का प्रहरी या विवाद का केंद्र? भारतीय न्यायपालिका पर विमर्श

December 04, 2025 04:59 PM
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संविधान का प्रहरी या विवाद का केंद्र? भारतीय न्यायपालिका पर विमर्श

सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय, न्यायिक नियुक्तियाँ, और न्यायिक अतिरेक की आलोचनाएँ

भारतीय न्यायपालिका आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। 5 करोड़ से अधिक लंबित मामलों के भार तले दबी न्यायपालिका को एक तरफ न्यायिक सक्रियता की प्रशंसा मिल रही है, तो दूसरी तरफ न्यायिक अतिरेक की आलोचना भी हो रही है।

भारतीय न्यायपालिका को लोकतंत्र का प्रहरी और नागरिक अधिकारों की अंतिम गारंटी माना जाता है। विशेषकर सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका संविधान की व्याख्या, मौलिक अधिकारों की रक्षा और शासन के संतुलन को बनाए रखने में केंद्रीय रही है। बीते दशकों में न्यायालय ने ऐसे ऐतिहासिक निर्णय दिए हैं जिन्होंने राजनीति, समाज और नागरिक स्वतंत्रताओं की दिशा तय की है।

"जहाँ एक ओर न्यायालय से अपेक्षा की जाती है कि वह कार्यपालिका और विधायिका पर अंकुश लगाए, वहीं दूसरी ओर कई बार उस पर संवैधानिक मर्यादा से आगे बढ़ने या महत्वपूर्ण मामलों में चुप्पी साध लेने का आरोप भी लगता है।"
लंबित मामलों का बोझ
सारांश:

प्रति मिनट 23 नए मामले जुड़ रहे हैं। जिला स्तर पर स्थिति सबसे गंभीर है।

न्यायाधीशों की कमी (प्रति 10 लाख)
सारांश:

भारत में जनसंख्या के अनुपात में न्यायाधीशों की संख्या अनुशंसित लक्ष्य से आधे से भी कम है।

⚠
चिंताजनक आँकड़े: सुप्रीम कोर्ट में ~86,700 मामले, उच्च न्यायालयों में 3 लाख+, और जिला न्यायालयों में 6 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
प्रमुख संवैधानिक निर्णय (2023-24)
चुनावी बॉन्ड योजना
फरवरी 2024

सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक घोषित किया। न्यायालय ने कहा कि मतदाताओं को राजनीतिक फंडिंग जानने का अधिकार है, जो स्वतंत्र मतदान के लिए आवश्यक है।

अनुच्छेद 370
दिसंबर 2023

जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने के केंद्र सरकार के निर्णय को वैध ठहराया। कोर्ट ने माना कि यह एक अस्थायी प्रावधान था।

आरक्षण में उप-वर्गीकरण
2024

7 जजों की पीठ ने राज्यों को SC/ST श्रेणियों में उप-वर्गीकरण की अनुमति दी ताकि आरक्षण का लाभ सबसे वंचितों तक पहुँच सके।

बिल्किस बानो केस
जनवरी 2024

गुजरात सरकार द्वारा 11 दोषियों की समय से पहले रिहाई को रद्द कर दिया गया। कोर्ट ने कानून के शासन को सर्वोच्च बताया।

कॉलेजियम प्रणाली का विकास
1981: प्रथम न्यायाधीश मामला
कार्यपालिका (सरकार) को जजों की नियुक्ति में अंतिम अधिकार दिया गया।
1993: द्वितीय न्यायाधीश मामला
कॉलेजियम प्रणाली का जन्म। मुख्य न्यायाधीश (CJI) की राय को प्राथमिकता मिली।
1998: तृतीय न्यायाधीश मामला
कॉलेजियम का विस्तार हुआ। इसमें अब CJI और 4 वरिष्ठतम जज शामिल होते हैं।
2015: NJAC निरस्तीकरण
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार द्वारा लाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को असंवैधानिक घोषित कर दिया।
प्रमुख आलोचनाएं:
  • ➤ अपारदर्शिता: नियुक्ति प्रक्रिया बंद कमरे में होती है।
  • ➤ भाई-भतीजावाद: 'अंकल जज' सिंड्रोम की शिकायतें।
  • ➤ जवाबदेही का अभाव: जनता के प्रति कोई सीधी जवाबदेही नहीं।
न्यायिक सक्रियता बनाम अतिरेक

जब न्यायपालिका कार्यपालिका के क्षेत्र में प्रवेश करती है, तो इसे 'अतिरेक' कहा जाता है।

मामला/आदेश न्यायालय का निर्देश आलोचना
राष्ट्रगान आदेश सिनेमा हॉल में फिल्म से पहले राष्ट्रगान अनिवार्य करना। व्यक्तिगत स्वतंत्रता और नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप।
हाइवे शराब प्रतिबंध राजमार्गों के 500 मीटर के भीतर शराब बिक्री पर रोक। लाखों नौकरियों का नुकसान और विधायी अधिकार क्षेत्र का हनन।
जॉली एलएलबी 2 फिल्म की समीक्षा के लिए विशेष समिति का गठन। सेंसर बोर्ड (CBFC) के वैधानिक अधिकारों की अनदेखी।
⚖️
न्यायाधीश संख्या
विधि आयोग की सिफारिश: 50 जज प्रति 10 लाख लोग (वर्तमान: केवल 21)।
💻
ई-कोर्ट मिशन
वर्चुअल सुनवाई, डिजिटल रिकॉर्ड और AI आधारित अनुवाद का विस्तार।
⏱️
प्रक्रियात्मक सुधार
लंबे अवकाश कम करना और स्थगन (Adjournment) पर रोक लगाना।

भारतीय न्यायपालिका आज एक चौराहे पर खड़ी है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है, तो दूसरी तरफ देरी और पारदर्शिता की कमी ने इसकी साख को चुनौती दी है।

"भविष्य की राह संतुलन में है। एक सशक्त, स्वतंत्र लेकिन जवाबदेह न्यायपालिका ही 'न्याय का शासन' सुनिश्चित कर सकती है। जैसा कि पूर्व CJI चंद्रचूड़ ने कहा था - 'हमें उत्कृष्टता के साथ-साथ सहानुभूति के संस्थान भी बनाने होंगे'।"

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