राज्य का दर्जा और अस्मिता की पुकार: लद्दाख के आंदोलन की पृष्ठभूमि और भविष्य
लद्दाख: राज्य का दर्जा और अस्मिता की पुकार
लद्दाख, जिसे 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया, आज अपनी विशिष्ट पहचान, जनजातीय अधिकारों और पर्यावरणीय संतुलन को लेकर व्यापक जनआंदोलन का केंद्र बना हुआ है। क्षेत्र की भौगोलिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक संवेदनशीलता इसे भारत के अन्य हिस्सों से अलग बनाती है। किंतु राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी, संसाधनों पर नियंत्रण और पारंपरिक जनजातीय अधिकारों के ह्रास को लेकर स्थानीय समुदायों में गहरी चिंता व्याप्त है।
यही कारण है कि लद्दाख के विभिन्न संगठन और नागरिक समूह लगातार छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक संरक्षण, पूर्ण राज्य का दर्जा, तथा हिमालयी पारिस्थितिकी को बचाने के लिए ठोस नीतिगत कदमों की मांग कर रहे हैं। इस आंदोलन के पीछे केवल राजनीतिक आकांक्षा ही नहीं, बल्कि आदिवासी जनजीवन, स्थानीय संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण की वास्तविक चिंताएँ भी जुड़ी हुई हैं।
विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि और कारण
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के पारित होने के बाद लद्दाख को एक केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला, लेकिन विधानसभा के बिना। इससे लद्दाख के लोगों में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और स्वायत्तता की कमी की भावना पैदा हुई है। जबकि जम्मू-कश्मीर को विधानसभा के साथ केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला, लद्दाख को सीधे केंद्रीय प्रशासन के अधीन रखा गया।
लद्दाख की जनसंख्या लगभग 3 लाख है, जिसमें से 97% से अधिक लोग अनुसूचित जनजाति से संबंधित हैं। यह विविधता और जनजातीय बहुलता छठी अनुसूची की मांग को मजबूत आधार प्रदान करती है।
आरेख 1: लद्दाख की धार्मिक जनसांख्यिकी - मुस्लिम (47%), बौद्ध (40%), हिंदू (12%)। यह विविधता क्षेत्र की सांस्कृतिक पहचान का मूल है।
मुख्य मांगें और आंदोलन के आयाम
लेह एपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (KDA) द्वारा प्रस्तुत चार मुख्य मांगें निम्नलिखित हैं:
- राज्य का दर्जा: केंद्र शासित प्रदेश से ऊपर उठकर स्व-शासन सुनिश्चित करने के लिए राज्य का दर्जा मांगा जा रहा है।
- छठी अनुसूची में शामिली: जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा के लिए संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग।
- अलग लोक सेवा आयोग: उच्च बेरोजगारी से निपटने के लिए अलग पब्लिक सर्विस कमिशन की स्थापना।
- दो संसदीय सीटें: एक के बजाय दो संसदीय सीटें, जिससे केंद्र में बेहतर प्रतिनिधित्व मिल सके।
लद्दाख में बेरोजगारी की दर चिंताजनक स्थिति में है। युवाओं में असंतोष मुख्यतः उच्च बेरोजगारी के कारण है, जहां 26.5% स्नातक बेरोजगार हैं, जो राष्ट्रीय औसत 13.4% से दोगुना है। 15-29 वर्ष आयु समूह में बेरोजगारी दर 33.6% तक पहुंच गई है। 2019 से अब तक राजपत्रित पदों के लिए कोई बड़ी भर्ती नहीं हुई है।
आरेख 2: बेरोजगारी दर तुलना (प्रतिशत में) - लद्दाख में स्नातक और युवाओं की बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से काफी अधिक है, जो युवाओं में असंतोष का मुख्य कारण है।
छठी अनुसूची: संवैधानिक प्रावधान
भारतीय संविधान की छठी अनुसूची अनुच्छेद 244 के तहत जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष प्रावधान करती है। इसका उद्देश्य जनजातीय समुदायों को स्वायत्तता प्रदान करना और उनकी भूमि, संस्कृति और संसाधनों की सुरक्षा करना है।
| प्रावधान | विवरण |
|---|---|
| स्वायत्त जिला परिषदें (ADCs) | विधायी, न्यायिक और प्रशासनिक शक्तियों वाली परिषदें। |
| विधायी अधिकार | भूमि, वन, जल, कृषि और सामाजिक रीति-रिवाजों पर कानून बनाने की शक्ति। |
| वित्तीय अधिकार | कर संग्रह और स्थानीय विकास निधियों का प्रबंधन। |
सोनम वांगचुक और पर्यावरण आंदोलन
प्रसिद्ध शिक्षाविद् और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे हैं। लद्दाख का नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र पर्यटन और औद्योगिक विकास के बढ़ते दबाव का सामना कर रहा है। वांगचुक ने 'जलवायु उपवास' (Climate Fast) और 'पश्मीना मार्च' जैसे शांतिपूर्ण तरीकों से इन मुद्दों को उठाया है।
सितंबर 2025: संघर्ष और गिरफ्तारियां
स्थिति तब और तनावपूर्ण हो गई जब 24 सितंबर 2025 को लेह में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। इस घटना में चार लोगों की मृत्यु की खबर आई और दर्जनों घायल हुए। इसके बाद सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में ले लिया गया। प्रशासन ने आरोप लगाया कि उनके भाषणों ने अशांति को बढ़ावा दिया। इसके अतिरिक्त, वांगचुक की संस्था SECMOL का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया।
आगे की राह
लद्दाख में चल रहा आंदोलन केवल स्थानीय मांगों का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत की संघीय व्यवस्था और जनजातीय अधिकारों के व्यापक सवालों को उठाता है। सरकार को डर है कि राज्य का दर्जा चीन के साथ सीमा पर सैन्य गतिविधियों को जटिल बना सकता है, जबकि स्थानीय नेतृत्व अपनी संस्कृति और पर्यावरण को बचाने के लिए इसे अनिवार्य मानता है। समाधान केवल निरंतर संवाद और आपसी विश्वास बहाली में निहित है।
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