डॉ. राजेश राजौरा: क्या 'ओवर पब्लिसिटी' बनी मुख्य सचिव की कुर्सी तक पहुँचने में बड़ी बाधा?
वरिष्ठ IAS अधिकारी के लगातार तीन बार चूकने से उठी चर्चा; प्रशासनिक सेवा में काम जितना शांत होता है, विश्वसनीयता उतनी ही अधिक मानी जाती है।
प्रशासनिक सेवा में अक्सर कहा जाता है कि सबसे ऊंचे पद तक पहुंचने के लिए केवल वरिष्ठता और कार्यकुशलता ही पर्याप्त नहीं होती। समय, परिस्थितियां, सरकार की प्राथमिकताएं और अधिकारी की सार्वजनिक छवि भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। मध्यप्रदेश में मुख्य सचिव की नियुक्ति के बाद एक बार फिर यह चर्चा तेज हो गई है कि वरिष्ठ आईएएस अधिकारी डॉ. राजेश राजौरा (1990) लगातार तीन अवसरों पर इस पद तक क्यों नहीं पहुंच सके।
यह एक संयोग भी हो सकता है और प्रशासनिक निर्णय का सामान्य परिणाम भी। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कुछ महत्वपूर्ण सवाल जरूर खड़े किए हैं।
प्रशासनिक गलियारों में वर्षों से एक कहावत प्रचलित है कि किसी अधिकारी का नाम यदि किसी पद के लिए बहुत पहले से और बहुत अधिक चर्चा में आने लगे, तो कई बार वही चर्चा उसके लिए चुनौती बन जाती है। जब अपेक्षाएं असामान्य रूप से बढ़ जाती हैं, तब अंतिम निर्णय लेने वाले कई अन्य विकल्पों पर भी विचार करते हैं। यह कोई लिखित नियम नहीं, बल्कि प्रशासनिक अनुभवों से निकला एक सामान्य निष्कर्ष है।
दूसरी बात यह कि किसी भी वरिष्ठ अधिकारी की पहचान उसके काम से बननी चाहिए, उसके समर्थकों या चाहने की सक्रियता से नहीं। कई बार किसी अधिकारी के आसपास ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि वह सबसे प्रभावशाली और सबसे निर्णायक व्यक्ति हैं। ऐसी छवि यदि स्वाभाविक न होकर कृत्रिम रूप से गढ़ी जाए, तो उसका उल्टा असर भी पड़ सकता है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकारें यह संदेश नहीं देना चाहतीं कि नियुक्तियां किसी प्रकार के प्रचार या दबाव से प्रभावित होती हैं।
प्रशासनिक सेवा का एक और अलिखित सिद्धांत है—अधिकारी जितना बड़ा होता है, उतना ही संयमित दिखाई देता है। अत्यधिक प्रचार, शक्ति प्रदर्शन या किसी विशेष सत्ता केंद्र के अत्यधिक निकट होने की सार्वजनिक धारणा कई बार लाभ के बजाय नुकसान पहुंचा सकती है। वरिष्ठ पदों पर केवल क्षमता ही नहीं, बल्कि संतुलन, गोपनीयता और संस्थागत गरिमा भी देखी जाती है।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मुख्य सचिव की नियुक्ति केवल वरिष्ठता के आधार पर नहीं होती। सरकार अपने प्रशासनिक एजेंडे, समन्वय क्षमता, नेतृत्व शैली और भविष्य की प्राथमिकताओं को देखते हुए निर्णय लेती है। इसलिए किसी अधिकारी का चयन न होना उसकी योग्यता का प्रमाण नहीं, बल्कि सरकार की पसंद का संकेत होता है।
डॉ. राजेश राजौरा के मामले में वास्तविक कारण क्या रहे, यह केवल सरकार ही बेहतर बता सकती है। उनके चयन न होने के पीछे किसी एक कारण को निर्णायक रूप से स्थापित करना उचित नहीं होगा। लेकिन यह घटनाक्रम प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के लिए एक सीख अवश्य छोड़ता है—काम जितना शांत और प्रभावी होगा, उसकी विश्वसनीयता उतनी ही अधिक होगी। पद की दौड़ में कई बार सबसे आगे दिखाई देने वाला व्यक्ति अंतिम मंजिल तक नहीं पहुंचता, जबकि शांत रहकर काम करने वाला अधिकारी निर्णायक क्षण में बाजी मार लेता है। जैसे नवागत मुख्य सचिव अशोक बर्णबाल (1991)।
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