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GOVERNANCE

लोकतंत्र की कसौटी पर परिसीमन और राजनीतिक समीकरण

December 03, 2025 03:07 PM
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लोकतंत्र की कसौटी पर परिसीमन और राजनीतिक समीकरण
लोकतंत्र की कसौटी पर परिसीमन

परिसीमन आयोग और भारतीय चुनाव: अवसर, विवाद और निहितार्थ

भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला समान प्रतिनिधित्व और न्यायपूर्ण निर्वाचन प्रक्रिया पर टिकी है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए संविधान में परिसीमन (Delimitation) की व्यवस्था की गई है, जिसके अंतर्गत समय-समय पर जनसंख्या के आधार पर संसदीय और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण किया जाता है। संविधान के अनुच्छेद 82 और 170, तथा परिसीमन आयोग अधिनियम (Delimitation Commission Acts) इस प्रक्रिया को वैधानिक आधार प्रदान करते हैं।

परिसीमन का प्राथमिक उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से चुने गए प्रतिनिधि लगभग समान संख्या में नागरिकों का प्रतिनिधित्व करें, जिससे लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की समानता बनी रहे। परंतु व्यवहार में परिसीमन केवल एक तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है; इसके दूरगामी राजनीतिक, सामाजिक और क्षेत्रीय निहितार्थ भी सामने आते हैं। निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्निर्धारण दलगत राजनीति, क्षेत्रीय संतुलन, जातीय और सामुदायिक समीकरणों, तथा संसदीय शक्ति-संतुलन को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में 1952, 1963, 1973 और 2002 में परिसीमन आयोग गठित किए गए। विशेष रूप से 1976 से 2001 तक और फिर 2026 तक के लिए परिसीमन पर लगी रोक यह दर्शाती है कि यह मुद्दा केवल जनसंख्या और निर्वाचन क्षेत्रों की गणना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह विकास बनाम जनसंख्या नियंत्रण, क्षेत्रीय असमानता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की जटिल बहसों से भी जुड़ा हुआ है।

"इस प्रकार, परिसीमन भारतीय लोकतंत्र की संरचना और संघीय राजनीति के स्वरूप को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। इसके परिणामस्वरूप संसदीय बहुमत, क्षेत्रीय दलों की शक्ति, और राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन बदल सकता है।"

परिसीमन: प्रक्रिया और संवैधानिक ढांचा

परिसीमन संविधान के अनुच्छेद 82 (लोकसभा) और अनुच्छेद 170 (विधानसभा) के अनुरूप होती है। प्रत्येक जनगणना के बाद एक स्वतंत्र 'परिसीमन आयोग' नियुक्त किया जाता है, जिसके आदेश कानूनी रूप से बाध्यकारी होते हैं और उन पर न्यायालय में प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।

1976 के 42वें तथा 2002 के 84वें संविधान संशोधनों के कारण वर्तमान परिसीमन 1971 की जनगणना को आधार मानकर ही हुआ था। संसदीय सीटों का नया वितरण 2026 के बाद ही संभव है, और तब तक मौजूदा सीटें यथावत रहेंगी।

वर्ष / घटना विवरण
1952, 63, 73, 02 चार बार परिसीमन आयोगों का गठन किया गया।
1976 (42वां संशोधन) परिसीमन पर रोक लगाई गई (1971 की जनगणना के आधार पर)।
2002 (84वां संशोधन) परिसीमन स्थगन को 2026 तक बढ़ाया गया।
2026 के बाद संभावित नया परिसीमन और सीटों का पुनर्वितरण।

आगामी परिसीमन की चिंता

दक्षिण भारत की चिंताएँ

  • जनसंख्या नियंत्रण के कारण कम प्रतिनिधित्व का डर।
  • तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक जैसे राज्यों को 'सुशासन' की सजा मिलने की आशंका।
  • सीटों की संख्या में संभावित कमी।

उत्तर भारत को लाभ

  • उत्तर प्रदेश (91+), बिहार, म.प्र. को जनसंख्या अनुपात में अधिक सीटें।
  • संसद में निर्णयकारी भूमिका और मजबूत होगी।
  • नए संसद भवन (888 सीटें) का निर्माण इसी विस्तार के लिए।

उत्तर भारत के प्रमुख राज्यों में सीटों की संभावित वृद्धि (अनुमानित)

नोट: यह डेटा लेख में उल्लेखित संभावित अनुमानों पर आधारित है।

मुख्य राजनीतिक निहितार्थ

संघीय संरचना और संतुलन

परिसीमन की प्रक्रिया भारत में "फेडरल बैलेंस" को गहराई से प्रभावित करती है। दक्षिण के राज्यों का तर्क है कि अधिक प्रजनन दर वाले उत्तर के राज्यों को अधिक सीटें देने से परिवार नियोजन की कोशिशों का उल्टा असर पड़ेगा।

राजनीति और केन्द्रीयकरण

यदि सीटों का प्रमुख हिस्सा उत्तर भारत को जाता है, तो केंद्र पर उनका दबदबा बढ़ेगा। इससे नीति निर्धारण में क्षेत्रीय विविधताओं की अनदेखी हो सकती है और राज्यों व केंद्र के बीच तनाव बढ़ सकता है।

चुनौतियाँ और समाधान

संभावित चुनौतियाँ:

  • कोर्ट के दखल की सीमा सीमित (अनुच्छेद 329)।
  • Gerrymandering: सीमांकन में राजनीतिक हेरफेर का खतरा।
  • राजस्व और संसाधनों के बंटवारे पर प्रभाव।

वैकल्पिक सुझाव:

  • ➤ नया मॉडल: जनसंख्या के बजाय 'प्रति राज्य' या 'गणितीय संतुलन' मॉडल (जैसे यूरोपीय संसद) पर विचार।
  • ➤ सरकारी आश्वासन: दक्षिण के हितों की रक्षा का भरोसा और संघीय संतुलन बनाए रखना।

"परिसीमन केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति, संघवाद और लोकतंत्र की गहराई से जुड़ा मुद्दा है। 2026 के बाद जब अगला परिसीमन होगा, तो यह देश की सत्ता संरचना, नीति दिशा और सामाजिक समीकरणों पर स्थायी छाप छोड़ सकता है। इसकी पारदर्शिता और निष्पक्षता ही देश की लोकतांत्रिक मजबूती के लिए आवश्यक है।"

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