जब बच्चे शिक्षा के अधिकार के लिए सड़कों पर उतरने लगें हम भारत के लोग... आखिर जिम्मेदारी किसकी है?
जब जेन अल्फा भी अपनी शिक्षा के अधिकार के लिए सड़कों पर उतरने लगे, तब संविधान की प्रस्तावना हमें क्या याद दिलाती है?
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में भीषण गर्मी के बीच बंद पड़े पंखों के विरोध में लगभग 1500 छात्र-छात्राएं हाथों में बैनर लेकर सड़कों पर उतर आए। राजस्थान के बाड़मेर, सिरोही और जालोर में छात्राओं ने शिक्षकों के रिक्त पदों और बुनियादी सुविधाओं की मांग को लेकर सड़क पर धरना दिया। बिहार के गया में बच्चों ने पंखे, पीने के पानी और बेंच-डेस्क की कमी से परेशान होकर स्कूल में तालाबंदी कर दी।
ये तीनों घटनाएँ अलग-अलग राज्यों की हैं, लेकिन इनकी पीड़ा एक ही है—बच्चे अब केवल पढ़ना नहीं चाहते, बल्कि पढ़ने योग्य वातावरण भी मांग रहे हैं।
यह खबरें बताती है कि अब केवल युवाओं की "जेन जी" ही नहीं, बल्कि "जेन अल्फा" के बच्चे भी अपनी शिक्षा, स्कूलों की मूलभूत सुविधाओं और शिक्षकों की कमी के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे हैं। यह केवल सरकार की विफलता का प्रश्न नहीं है, बल्कि हमारे समाज के आत्ममंथन का विषय भी है।
हर समस्या का समाधान केवल सरकार बदलने में खोज लेना आसान है। लेकिन संविधान का पहला पन्ना हमें इससे कहीं बड़ी जिम्मेदारी सौंपता है।
संविधान की प्रस्तावना की शुरुआत होती है—
"हम भारत के लोग..."
यहीं से उत्तर भी शुरू होता है।
संविधान यह नहीं कहता कि "सरकार ऐसा भारत बनाएगी।"
वह कहता है कि "हम भारत के लोग" ऐसा भारत बनाएंगे, जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व स्थापित होगा।
यानी अवसरों की समानता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
सरकारें कानून बना सकती हैं। उन्होंने बना भी दिए हैं। शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाया गया। शिक्षा का अधिकार (RTE) कानून लागू हुआ। प्रत्येक स्कूल में शाला प्रबंधन समिति (SMC) बनाई गई। कानूनों में यह भी लिखा है कि स्कूल में शिक्षक कितने होंगे, शौचालय कैसे होंगे, पेयजल, पुस्तकालय, खेल मैदान जैसी सुविधाएँ कैसी होंगी।
लेकिन प्रश्न यह है कि इन कानूनों को जीवंत कौन बनाएगा? हम भारत के लोग।
क्या सरकार अकेले सामाजिक सौहार्द ला सकती है?
क्या सरकार अकेले समानता स्थापित कर सकती है?
क्या सरकार अकेले न्याय सुनिश्चित कर सकती है?
नहीं। इन मूल्यों को समाज को जीना पड़ता है।
आज भारत की शिक्षा व्यवस्था में सबसे बड़ी असमानता दिखाई देती है। एक ओर विश्वस्तरीय निजी विद्यालय हैं, दूसरी ओर ऐसे सरकारी स्कूल जहाँ पंखे तक नहीं चलते, शिक्षक नहीं हैं, पीने का पानी नहीं है। यह केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की परीक्षा भी है।
दुनिया के जिन देशों की शिक्षा व्यवस्था उत्कृष्ट मानी जाती है, वहाँ पूरा समुदाय अपने पड़ोस के स्कूल को अपना विद्यालय मानता है। वहाँ "नेबरहुड स्कूल" केवल भवन नहीं, समाज का साझा दायित्व होता है।
भारत में भी शाला प्रबंधन समितियाँ बनी हैं, लेकिन अधिकांश स्थानों पर वे केवल कागज़ों तक सीमित हैं। यदि ये समितियाँ सक्रिय हो जाएँ, यदि माता-पिता, स्थानीय नागरिक, शिक्षित युवा, सामाजिक संगठन और मीडिया मिलकर अपने-अपने स्कूलों की जिम्मेदारी लें, तो तस्वीर बदल सकती है।
शायद अब समय आ गया है कि पूरे देश में "समान शिक्षा संकल्प सम्मेलन" आयोजित हों, जहाँ लोग केवल सरकार से माँग न करें, बल्कि स्वयं यह संकल्प लें कि अपने क्षेत्र के प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाएँगे।
मीडिया की भी बड़ी जिम्मेदारी है। यदि भ्रष्टाचार, राजनीति और अपराध समाचार बन सकते हैं, तो सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता, शिक्षा में असमानता और अच्छे स्कूलों के सफल मॉडल भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनने चाहिए।
जब बच्चे सड़कों पर उतरने लगें, तो यह केवल विरोध नहीं होता; यह समाज के लिए चेतावनी होती है।
आइए, एक बार फिर संविधान की प्रस्तावना पढ़ें।
उसमें लिखा है— "हम भारत के लोग..."
शायद भारत का भविष्य इसी वाक्य में छिपा है। सरकारें अपना काम करेंगी, लेकिन भारत वैसा तभी बनेगा जैसा संविधान चाहता है, जब हम भारत के लोग अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे।
डॉ. अनिल सिरवैया
image source: gemini ai
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