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राज्यपाल बनाम राज्य सरकार: संवैधानिक नैतिकता और टकराव की राजनीति राज्यपालों की नियुक्ति: राज्य सरकारों के साथ विवाद और टकराव

October 29, 2025 03:32 PM
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राज्यपाल बनाम राज्य सरकार: संवैधानिक नैतिकता और टकराव की राजनीति राज्यपालों की नियुक्ति: राज्य सरकारों के साथ विवाद और टकराव

Governor versus State Government: Constitutional morality and the politics of confrontation

सोशल जस्टिस डेस्क

भारतीय संविधान में राज्यपाल की संस्था को संघीय ढाँचे और राज्यों की स्वायत्तता के बीच एक संतुलनकारी कड़ी के रूप में परिकल्पित किया गया था। संविधान सभा की बहसों में यह बार-बार रेखांकित किया गया कि राज्यपाल “संवैधानिक प्रमुख” होंगे, न कि सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता। संविधान के अनुच्छेद 153 से 162 राज्यपाल के अधिकार और कर्तव्यों का निर्धारण करते हैं, परंतु उनकी नियुक्ति का अधिकार केंद्र के पास निहित है। यही वह बिंदु है जहाँ से संघीय सिद्धांत (Federal Principle) और एकात्मक प्रवृत्ति (Unitary Bias) के बीच द्वंद्व उत्पन्न होता है।

व्यवहारिक अनुभव यह दर्शाता है कि राज्यपालों की नियुक्ति और उनकी भूमिका अक्सर राजनीतिक वफादारी और केंद्रीय हस्तक्षेप से प्रभावित रही है। इससे राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति को लेकर विवाद गहराते हैं। राज्य सरकारों का आरोप रहता है कि राज्यपाल, निर्वाचित सरकारों के निर्णयों में अनावश्यक हस्तक्षेप करते हैं — जैसे विधानसभाओं का सत्र बुलाने या टालने, विधेयकों को लंबित रखने, या विश्वविद्यालयों में कुलाधिपति की भूमिका में नीतिगत टकराव पैदा करने में। इससे राज्यपाल और राज्य सरकारों के बीच टकराव एक संस्थागत स्वरूप ग्रहण कर लेता है।

भारतीय न्यायपालिका ने भी इन विवादों को बार-बार सुलझाने का प्रयास किया है। एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) ने संघीय ढाँचे को संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) का हिस्सा माना। नबम रेबिया बनाम अरुणाचल प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष (2016) में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल की विवेकाधीन शक्तियों की सीमा तय की। इन निर्णयों ने यह सिद्ध किया कि राज्यपाल को संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का पालन करना चाहिए और उनकी भूमिका राजनीतिक दलगत हितों से ऊपर होनी चाहिए।

इस विमर्श के केंद्र में यह प्रश्न है कि क्या भारतीय संघवाद वास्तव में सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) की दिशा में विकसित हो रहा है, या फिर राज्यपाल की संस्था के माध्यम से केंद्र एक नियंत्रणकारी संघवाद (Controlled Federalism) लागू कर रहा है। राज्यपाल की नियुक्ति से जुड़ा विवाद केवल पद की औपचारिकता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की उस मौलिक चुनौती को उजागर करता है, जहाँ संघ और राज्य के बीच विश्वास, सहयोग और संवैधानिक सीमाओं का पालन अनिवार्य है।

अतः राज्यपाल की भूमिका और नियुक्ति पर हो रहे टकरावों का अध्ययन न केवल भारतीय संविधान की व्याख्या के लिए आवश्यक है, बल्कि यह संघीय लोकतंत्र के भविष्य और संवैधानिक नैतिकता की व्यवहारिक प्रासंगिकता को समझने की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

संवैधानिक ढांचा और नियुक्ति प्रक्रिया

नियुक्ति की प्रक्रिया

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है, जो व्यावहारिक रूप में केंद्र सरकार की सलाह पर होती है। राज्यपाल का कार्यकाल पांच वर्ष का होता है, परंतु अनुच्छेद 156 के तहत वह "राष्ट्रपति की इच्छा पर" अपना पद धारण करता है। इसका अर्थ यह है कि केंद्र सरकार किसी भी समय राज्यपाल को हटा सकती है।

योग्यता और शर्तें

संविधान के अनुच्छेद 157-158 में राज्यपाल की योग्यताएं निर्धारित हैं। राज्यपाल को भारत का नागरिक होना चाहिए, 35 वर्ष की आयु पूर्ण करनी चाहिए, और वह संसद या राज्य विधानमंडल का सदस्य नहीं होना चाहिए। हालांकि, संविधान में राज्यपाल की नियुक्ति में राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श का कोई प्रावधान नहीं है।

मुख्य विवाद के क्षेत्र

विधेयकों पर अनिश्चितकालीन रोक

राज्यपालों और राज्य सरकारों के बीच सबसे बड़ा विवाद अनुच्छेद 200 के तहत विधेयकों की मंजूरी में देरी का है। तमिलनाडु के मामले में राज्यपाल आर.एन. रवि ने 2020 से 2023 के बीच 12 विधेयकों को चार वर्षों तक लंबित रखा। सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 के अपने ऐतिहासिक फैसले में इसे "गैरकानूनी और त्रुटिपूर्ण" घोषित किया।

केरल में भी राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने 8 विधेयकों को दो वर्षों से अधिक समय तक रोके रखा, जिसके कारण राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।

अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग

राष्ट्रपति शासन की सिफारिश में राज्यपालों की भूमिका अत्यंत विवादास्पद रही है। 1950 से 2025 तक अनुच्छेद 356 का 105 बार प्रयोग हुआ है, जिसमें से अधिकांश मामलों में राजनीतिक कारणों से दुरुपयोग का आरोप लगा है।

Article 356 Usage Timeline: Decline in President's Rule Invocations

1981-1990 की अवधि में इसका सर्वाधिक दुरुपयोग हुआ, जब 35 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया। एसआर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विधानसभा में बहुमत की जांच फ्लोर टेस्ट से होनी चाहिए, न कि राज्यपाल की व्यक्तिगत राय से।

विश्वविद्यालयी नियुक्तियों में हस्तक्षेप

कई राज्यों में राज्यपालों ने विश्वविद्यालयों के कुलपति के रूप में अपनी भूमिका का दुरुपयोग किया है। पश्चिम बंगाल में राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस और राज्य सरकार के बीच विश्वविद्यालयी नियुक्तियों को लेकर गंभीर विवाद हुआ है।

हालिया विवादास्पद मामले

तमिलनाडु: ऐतिहासिक न्यायिक हस्तक्षेप

तमिलनाडु राज्यपाल आर.एन. रवि और डीएमके सरकार के बीच विवाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण साबित हुआ है। 31 अक्टूबर 2023 को तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें राज्यपाल पर विधेयकों को अनिश्चितकाल तक रोकने का आरोप लगाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने 8 अप्रैल 2025 को अपने 415 पृष्ठ के फैसले में राज्यपाल की कार्यवाही को "गैरकानूनी" घोषित किया और अनुच्छेद 142 के तहत 10 लंबित विधेयकों को मंजूरी दे दी।

पश्चिम बंगाल: निरंतर संघर्ष

पश्चिम बंगाल में राज्यपाल सी.वी. आनंद बोस और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच निरंतर टकराव चल रहा है। चुनाव के बाद हिंसा के पीड़ितों से मिलने पर रोक, मुर्शिदाबाद हिंसा के दौरान राज्यपाल की यात्रा, और अपराजिता बिल पर तकनीकी रिपोर्ट न भेजने जैसे मुद्दों पर विवाद हुआ है।

राज्यपाल ने मुख्यमंत्री पर 44 करोड़ रुपये का मानहानि नोटिस भी भेजा है।

केरल: दीर्घकालिक संवैधानिक संकट

केरल में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान और एलडीएफ सरकार के बीच विवाद कई वर्षों से चल रहा है। राज्यपाल के खिलाफ एसएफआई के काले झंडे प्रदर्शन और उन्हें केंद्रीय सुरक्षा प्रदान करने की घटनाओं ने संवैधानिक संकट को और गहरा बना दिया है।

न्यायिक हस्तक्षेप और कानूनी ढांचा

B.P. सिंघल बनाम भारत संघ (2010)

सुप्रीम कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण मामले में राज्यपालों की हटाने की शक्ति पर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:

  • राज्यपाल को मनमाने तरीके से नहीं हटाया जा सकता
  • केंद्र सरकार में परिवर्तन राज्यपाल हटाने का आधार नहीं है
  • राज्यपाल की हटाने की कार्यवाही न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है

हालिया न्यायिक फैसले

तमिलनाडु मामले में सुप्रीम कोर्ट का 2025 का फैसला राज्यपालों की शक्तियों पर एक मील का पत्थर है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राज्यपाल विधेयकों को अनिश्चितकाल तक नहीं रोक सकते और "उचित समय" में निर्णय लेना आवश्यक है।

आयोगों की सिफारिशें

सरकारिया आयोग (1988)

सरकारिया आयोग ने राज्यपालों के संबंध में व्यापक सुधार की सिफारिशें दी थीं:

  • राज्यपालों को पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा करने देना चाहिए
  • "दुर्लभ और बाध्यकारी" परिस्थितियों में ही हटाना चाहिए
  • अनुच्छेद 356 का अत्यंत संयमित प्रयोग करना चाहिए

पंछी आयोग (2010)

पंछी आयोग की सबसे क्रांतिकारी सिफारिशें थीं:

  • "राष्ट्रपति की इच्छा पर" वाक्य को संविधान से हटाना
  • राज्यपाल को केवल राज्य विधानमंडल के प्रस्ताव से हटाना
  • राज्यपाल का निश्चित पांच वर्षीय कार्यकाल
  • राज्य के विधेयकों पर छह महीने में निर्णय

वेंकटचलैया आयोग (2002)

इस आयोग ने राज्यपाल हटाने से पहले मुख्यमंत्री से परामर्श की सिफारिश की थी।

समसामयिक चुनौतियां

राजनीतिक तटस्थता का संकट

राज्यपालों पर केंद्र सरकार के "एजेंट" के रूप में कार्य करने का आरोप लगातार लगता रहता है। विशेषकर जब केंद्र और राज्य में अलग-अलग दलों की सरकारें होती हैं तो यह समस्या और गंभीर हो जाती है।

न्यायिक नियुक्तियों का विवाद

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश एस. अब्दुल नजीर को कर्नाटक का राज्यपाल नियुक्त करने पर विवाद हुआ है। कांग्रेस ने इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया है।

संवैधानिक गतिरोध

राज्यपालों की कार्यवाही से कई राज्यों में शासन में गतिरोध की स्थिति पैदा हो रही है। विधेयकों पर देरी से राज्य सरकारों की नीतियों का क्रियान्वयन बाधित हो रहा है।

सुधार की आवश्यकता

तत्काल आवश्यक सुधार

राज्यपाल के पद को प्रभावी बनाने के लिए निम्नलिखित सुधारों की आवश्यकता है:

नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार: राज्यपाल की नियुक्ति में राज्य के मुख्यमंत्री से परामर्श को अनिवार्य बनाना चाहिए।

निश्चित कार्यकाल: पंछी आयोग की सिफारिश के अनुसार राज्यपाल का निश्चित पांच वर्षीय कार्यकाल होना चाहिए।

समयसीमा निर्धारण: राज्य विधेयकों पर निर्णय के लिए स्पष्ट समयसीमा निर्धारित करनी चाहिए।

जवाबदेही सुनिश्चित करना: राज्यपाल के कार्यों की न्यायिक समीक्षा की व्यवस्था को मजबूत बनाना चाहिए।

दीर्घकालिक संस्थागत सुधार

भारतीय संघवाद को मजबूत बनाने के लिए राज्यपाल के पद में मौलिक सुधार आवश्यक हैं। राज्यपाल को वास्तव में निष्पक्ष संवैधानिक प्रमुख बनाने के लिए उसकी नियुक्ति, कार्यकाल और शक्तियों में संतुलन स्थापित करना होगा।

राज्यपालों की नियुक्ति और उनकी भूमिका का मुद्दा भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता की परीक्षा है। सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों ने इस दिशा में सकारात्मक पहल की है, परंतु व्यापक संवैधानिक सुधार की आवश्यकता अभी भी बनी हुई है। केंद्र और राज्य सरकारों को मिलकर इस संस्थागत समस्या का स्थायी समाधान खोजना होगा ताकि राज्यपाल का पद वास्तव में संघवाद को मजबूत बनाने वाला सेतु बन सके, न कि विवाद का कारण।

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