भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) विवाद: विपक्ष, चुनाव आयोग और वैश्विक संदर्भ
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) भारत के चुनावी इतिहास की सबसे बड़ी डिजिटल क्रांति है, लेकिन इसके इस्तेमाल को लेकर विवाद बार-बार गरमाते हैं। ईवीएम से जुड़े विवाद, विपक्ष की असंतुष्टि, चुनाव आयोग का विश्वास, और अंतरराष्ट्रीय अनुभव पर तथ्य आधारित आलेख यहां प्रस्तुत है।
भारत में ईवीएम विवाद: विवाद के मुख्य कारण
- छेड़छाड़ की आशंका: विपक्षी पार्टियों, विशेष रूप से चुनावों में हार के बाद, बार-बार आरोप लगाती हैं कि ईवीएम में हैकिंग या छेड़छाड़ संभव है। तकनीकी विशेषज्ञों ने भी मशीन में संभावित गड़बड़ी या हेरफेर की संभावना जताई है, जिसमें गलत पार्टी या उम्मीदवार को वोट जाना या डाले ही नहीं गए वोट का रिकॉर्ड आना शामिल है.
- पारदर्शिता की कमी: मशीन से अंदरूनी वोटिंग प्रक्रिया पारदर्शी नहीं मानी जाती; अधिकांश मशीनें 'ऑडिटेबल' नहीं हैं, जिससे मतदाता सुनिश्चित नहीं कर सकते कि उनका वोट सही पार्टी को गया या नहीं.
- विश्वास और धारणा का संकट: राजनीतिक दलों के बीच आम धारणा है कि हारने वाली पार्टी ईवीएम को दोष देती है, लेकिन चुनाव आयोग और अदालतें बार-बार असंतुष्टि को 'हार का बहाना' मानती हैं और मशीनों में गड़बड़ी के पर्याप्त सबूत ना मिलने पर अधिकांश याचिकाएं खारिज कर देती हैं.
विपक्ष की चिंता और विरोध के मुख्य तर्क
- तकनीकी परीक्षण/हैकिंग के मामले: विपक्ष, तकनीकी विशेषज्ञों (जैसे हैदराबाद के हरि प्रसाद और जे एलेक्स हॉल्डरमैन) द्वारा मशीन के हैक किए जाने के दावों का हवाला देता है.
- सीमित VVPAT मिलान: सुप्रीम कोर्ट की याचिका (2013, स्वामी बनाम चुनाव आयोग) के बाद सिर्फ चुनिंदा सीटों पर VVPAT (मतदाता सत्यापन आडिट ट्रेल) पर्चियों का मिलान होता है, जबकि विपक्ष 100% मिलान चाहता है.
- अंतरराष्ट्रीय संदर्भ: विपक्ष तर्क देता है कि दुनिया के अधिकांश विकसित देशों (जैसे अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड, आयरलैंड, नॉर्वे) ने ईवीएम पर रोक लगा दी है और बैलेट पेपर लौट गए हैं, तो भारत क्यों नहीं.
चुनाव आयोग का ईवीएम पर विश्वास और तर्क
- छेड़छाड़-रहित डिज़ाइन: भारतीय ईवीएम स्टैंडअलोन मशीन हैं, इंटरनेट, वाई-फाई या ब्लूटूथ से कनेक्ट नहीं, जिससे रिमोट हैकिंग असंभव मानी जाती है.
- सुरक्षा और टेस्टिंग: प्रत्येक मशीन चुनाव से पहले कई चरणों की जांच, पुलिस निगरानी में ट्रांसपोर्ट, सील और मतदान एजेंटों की उपस्थिति में टेस्टिंग से गुजरती है.
- अदालतों का समर्थन: सुप्रीम कोर्ट एवं उच्च न्यायालयों ने अधिकांश याचिकाएं खारिज की हैं, मशीनों की विश्वसनीयता पर असंतोषजनक सबूत न होने की बात कही है.
- VVPAT का समावेश: मशीन से वोट डालने के बाद मतदाता को पेपर पर्ची दिखती है, जिससे वह आश्वस्त हो सकता है.
ईवीएम का वैश्विक इतिहास, वर्तमान स्थिति और बंद करने वाले देश
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देश |
पहला उपयोग (वर्ष) |
वर्तमान स्थिति |
ईवीएम पर रोक लगाने का वर्ष |
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अमेरिका |
1964 |
आंशिक उपयोग |
कई राज्यों में वापसी बैलेट |
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भारत |
1982 (केरल) |
पूरे देश में लागू |
— |
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नीदरलैंड |
1990s |
बंद |
2007 |
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जर्मनी |
2000s |
बंद |
2009 (अदालत द्वारा असंवैधानिक) |
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आयरलैंड |
2002 |
बंद |
2006 |
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नॉर्वे |
2002 |
बंद |
2011 |
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ब्राजील |
1996 |
अभी उपयोग |
— |
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बेल्जियम |
1991 |
आंशिक उपयोग |
— |
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ऑस्ट्रेलिया |
2001 |
सीमित |
— |
वर्तमान में 34 देशों ने किसी न किसी रूप में ईवीएम का प्रयोग किया है, लेकिन इनमें से 15 से अधिक देशों ने सुरक्षा, पारदर्शिता या तकनीकी कमजोरियों के चलते इसे बंद कर दिया है; अधिकांश देश बैलेट पेपर वापस लौट आए हैं.
अदालती याचिकाएँ और न्यायालयों का नजरिया
- सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाएँ: सैकड़ों याचिकाएँ दायर की गई हैं; सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में VVPAT लागू करने का आदेश दिया था लेकिन सभी मशीनों पर नहीं.
- हाई कोर्ट में केस: दिल्ली हाई कोर्ट, बॉम्बे हाई कोर्ट समेत कई अदालतों ने ईवीएम की सुरक्षा और छेड़छाड़ के दावों पर जांच की, लेकिन पर्याप्त प्रमाण न मिलने पर याचिकाएं खारिज कर दी.
- अदालतों की संतुलित राय: न्यायालयों का सामान्य नजरिया है कि हार के बाद पार्टियों द्वारा विश्वसनीयता पर सवाल उठाना आम है; जबतक ठोस तकनीकी प्रमाण न हों, मशीन छेड़छाड़ के आरोप स्वीकार्य नहीं.
भविष्य की राह: ईवीएम रहेगा या बैलेट पेपर?
- वर्तमान रुख: चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट की राय में भारत में EVM और VVPAT की व्यवस्था बनी रहेगी; बैलेट पेपर पर लौटने का कोई संकेत नहीं.
- विपक्ष की मांग: विपक्ष बार-बार बैलेट पेपर की ओर लौटने या 100% VVPAT मिलान की मांग करता है, लेकिन आयोग इसे अव्यवहारिक मानता है.
- तकनीकी सुधार: भविष्य में मशीनों में और अधिक पारदर्शिता और ऑडिटेबल फीचर्स लाने पर चर्चा जारी हैं, लेकिन फिलहाल EVM प्रणाली बरकरार रहेगी.
ईवीएम के संदर्भ में भारत के लोकतंत्र का जनमत
जनता के एक हिस्से का भरोसा
व्यापक स्तर पर शहरी-ग्रामीण मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा, चुनाव आयोग की मशीन पर भरोसा करता है और तेज़ नतीजों को सराहता है।
संशय का माहौल
लगातार चुनावों में एक ही दल के जीतने, पोस्टल बैलेट बनाम ईवीएम में परिणाम भिन्न होने, और हारने वाले दलों की असंतुष्टि के कारण, कुछ मतदाताओं में संशय का माहौल देखने को मिलता है।
VVPAT और पारदर्शिता की मांग
काफी संख्या में लोगों को VVPAT स्लिप और ऑडिट, तकनीकी ऑडिट प्रक्रिया आदि से भरोसा मिलता है, लेकिन विपक्ष की आलोचना के चलते 100% मिलान की मांग समय-समय पर बढ़ती रहती है।
सोशल मीडिया और अफवाहें
सोशल मीडिया पर छेड़छाड़, मैनेजमेंट या मशीन संबंधी अफवाहें और खबरें जनमत को प्रभावित करती हैं लेकिन ठोस प्रमाण पेश नहीं होते।
ईवीएम की उपयोगिता और लोकतंत्र की मजबूती
तेज़ और सूचिता पूर्ण परिणाम
विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत जैसे विशाल देश में जहां करोड़ों वोटिंग होती है—ईवीएम की मदद से 24 घंटे के भीतर पारदर्शी व भरोसेमंद परिणाम संभव होते हैं।
बहस का विषय: पारदर्शिता और जन-संशय
अधिकांश चुनाव विशेषज्ञ पारदर्शिता बनाए रखने के लिए तकनीकी अपग्रेड (VVPAT, ऑडिट, पब्लिक डेमो) की सलाह देते हैं; साथ ही विपक्ष का आरोप है कि जब दुनिया भर के लोकतंत्र बैलेट पेपर की ओर लौट रहे हैं, भारत को सतर्क रहना चाहिए।
न्यायालयों का नजरिया
अधिकांश भारतीय अदालतों ने ठोस तकनीकी प्रमाण न होने या गड़बड़ी की व्यापकता न मिलने पर ईवीएम के पक्ष में निर्णय दिए हैं; हालांकि नियमित ऑडिट व पारदर्शिता पर जोर दिया है।
भारत में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन निस्संदेह एक यथार्थवादी चुनावी प्रगति है, लेकिन विश्वास, पारदर्शिता और छेड़छाड़ की आशंका के कारण इस पर विपक्ष का असंतोष बना रहता है। वैश्विक अनुभव उन्नत देशों का बैलेट पर लौटना दिखाता है, हालांकि भारत में अदालतों और चुनाव आयोग का विश्वास बरकरार है। तकनीकी सुधार और व्यापक ऑडिट के साथ भविष्य में EVM प्रणाली बनी रहेगी, लेकिन सर्वोच्च पारदर्शिता और सुरक्षा के लिए सतत सुधार आवश्यक हैं।
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