भारत स्मार्ट सिटी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और विकसित भारत की बात कर रहा है। हमारे शहर आधुनिक हो रहे हैं, डिजिटल सेवाएँ बढ़ रही हैं और स्वच्छता को राष्ट्रीय अभियान का रूप दिया गया है। सफाईकर्मियों को सम्मान के साथ ‘सफाईमित्र’ भी कहा जाता है।
लेकिन चमकते शहरों और साफ सड़कों के नीचे एक कड़वी सच्चाई छिपी है। आज भी इंसान सीवर और सेप्टिक टैंक में उतर रहे हैं और अपनी जान गंवा रहे हैं।
सवाल केवल इतना नहीं है कि ये मौतें क्यों हो रही हैं। बड़ा सवाल यह है कि आधुनिक भारत में यह खतरनाक काम आखिर किन सामाजिक समूहों के हिस्से में आता रहा है?
केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय ने जुलाई 2026 में लोकसभा को बताया कि राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग (NCSK) के अनुसार 1 जनवरी 2021 से 30 जून 2026 के बीच 18 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में सीवर और सेप्टिक टैंक की जोखिमपूर्ण सफाई करते हुए 332 सफाईकर्मियों की मौत हुई। पिछले पाँच वर्षों में ऐसी जोखिमपूर्ण मैनुअल सफाई के संबंध में एजेंसियों और अधिकारियों के खिलाफ 193 एफआईआर भी दर्ज की गईं।
332 को केवल सरकारी आँकड़े की तरह पढ़ना आसान है। लेकिन हर संख्या के पीछे एक व्यक्ति था। कोई पिता था, कोई बेटा, कोई पति और किसी परिवार का कमाने वाला सदस्य। वह सुबह काम पर गया था, लेकिन घर वापस नहीं लौटा।
भारत में सफाई का काम केवल श्रम का प्रश्न नहीं रहा है। इसका जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता के इतिहास से गहरा संबंध रहा है। विशेष रूप से मैला ढोने और जोखिमपूर्ण सफाई जैसे अमानवीय कार्य ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर रखे गए दलित समुदायों पर थोपे जाते रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने 2023 के डॉ. बलराम सिंह बनाम भारत संघ मामले में इस संबंध को बहुत स्पष्ट रूप से रेखांकित किया। न्यायालय ने जोखिमपूर्ण सफाई को अस्पृश्यता की अभिव्यक्ति से जोड़ा और सीवर की मैनुअल सफाई को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के निर्देश दिए।
इसलिए सीवर में होने वाली मौत को केवल नगर निगम की लापरवाही या दुर्घटना मान लेना पर्याप्त नहीं है। यह सामाजिक न्याय, जाति, श्रम और मानवीय गरिमा का भी प्रश्न है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 14 प्रत्येक व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता और कानूनों के समान संरक्षण की गारंटी देता है। यदि समाज का एक विशेष रूप से वंचित हिस्सा पीढ़ियों तक सबसे गंदे और जानलेवा कामों से जुड़ा रहता है, तो हमें पूछना चाहिए कि संवैधानिक समानता उसके जीवन में कहाँ दिखाई देती है?
इसी तरह अनुच्छेद 21 केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं देता। सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक व्याख्या में जीवन का अधिकार मानवीय गरिमा से जुड़ा हुआ है। सीवर मौतों से संबंधित 2023 के फैसले में भी न्यायालय ने व्यक्ति की गरिमा को अनुच्छेद 21 से जोड़ते हुए पुनर्वास की आवश्यकता पर जोर दिया。
भारत में इसके खिलाफ स्पष्ट कानून मौजूद है। Prohibition of Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 की धारा 7 सीवर और सेप्टिक टैंक की जोखिमपूर्ण सफाई के लिए किसी व्यक्ति को नियुक्त करने या काम पर लगाने पर रोक लगाती है।
सरकार ने National Action for Mechanised Sanitation Ecosystem (NAMASTE) योजना भी शुरू की है। इसका उद्देश्य सफाईकर्मियों की सुरक्षा, गरिमा, सामाजिक सुरक्षा और सीवर-सफाई के मशीनीकरण को बढ़ाना है।
सितंबर 2026 की सरकारी प्रगति जानकारी के अनुसार, देश के सभी 36 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में 90,186 सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मियों का सत्यापन किया जा चुका था। इससे पहले जुलाई 2026 तक 87,000 से अधिक PPE किट वितरित की जा चुकी थीं।
ये कदम जरूरी हैं। लेकिन असली कसौटी योजना की घोषणा या PPE किट की संख्या नहीं हो सकती। असली कसौटी यह होनी चाहिए कि सीवर में कितने इंसानों को उतरना पड़ा और उनमें से कितने सुरक्षित घर लौटे।
आज जब सक्शन मशीनें, हाई-प्रेशर जेटिंग मशीनें, रोबोटिक उपकरण और गैस डिटेक्शन तकनीक उपलब्ध हैं, तब जहरीले सीवर में किसी इंसान को उतारना सामान्य व्यवस्था नहीं रहनी चाहिए।
सिर्फ मशीनें खरीदना पर्याप्त नहीं होगा। भारत को उस सामाजिक व्यवस्था को भी बदलना होगा जिसमें सफाई का पेशा पीढ़ी-दर-पीढ़ी कुछ समुदायों से जुड़ गया।
सफाई सेवा को जाति आधारित पेशे के बजाय प्रशिक्षित, सुरक्षित और सम्मानजनक पेशा बनाना होगा। भर्ती सभी योग्य नागरिकों के लिए खुली और पारदर्शी होनी चाहिए। कर्मचारियों को उचित वेतन, स्वास्थ्य बीमा, सामाजिक सुरक्षा, नियमित प्रशिक्षण और आधुनिक सुरक्षा उपकरण मिलने चाहिए।
साथ ही, जिन परिवारों की कई पीढ़ियाँ जोखिमपूर्ण सफाई कार्य पर निर्भर रही हैं, उनके बच्चों को शिक्षा, छात्रवृत्ति, कौशल प्रशिक्षण, स्वरोजगार और वैकल्पिक रोजगार के वास्तविक अवसर देने होंगे।
किसी बच्चे का भविष्य उसके माता-पिता की जाति या पेशे से तय नहीं होना चाहिए।
हम स्वच्छ भारत की सफलता को केवल बने हुए शौचालयों, साफ सड़कों या एकत्र किए गए कचरे से नहीं माप सकते। हमें तीन और सवाल पूछने होंगे:
- सीवर किसने साफ किया?
- क्या उसके पास सुरक्षा थी?
- क्या वह काम के बाद जीवित अपने घर लौटा?
भारत का अगला स्वच्छता लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए: जोखिमपूर्ण सीवर सफाई में मानव प्रवेश को समाप्त करना, सफाई का पूर्ण मशीनीकरण करना, सफाईकर्मियों को पेशेवर और सामाजिक सुरक्षा देना तथा जाति और सफाई कार्य के ऐतिहासिक संबंध को तोड़ना।
स्मार्ट सिटी की असली पहचान केवल सेंसर, कैमरे, ऐप और डिजिटल सेवाएँ नहीं हैं। उसकी पहचान इस बात से भी होगी कि शहर अपने सबसे अदृश्य श्रमिक के जीवन को कितना मूल्य देता है।
जिस दिन किसी दलित या किसी भी सफाईकर्मी को रोजी कमाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर सीवर में नहीं उतरना पड़ेगा, उस दिन हम कह सकेंगे कि संविधान का अनुच्छेद 14 जमीन पर बराबरी दे रहा है और अनुच्छेद 21 हर नागरिक को गरिमा के साथ जीने का अधिकार दे रहा है。
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